Satyam Bruyat - Career Solution: आपातकाल के दौरान इंदिरा का विरोध करने वाले जयप्रकाश नारायण की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Jayprakash Narayan who opposed Indira Gandhi during Emergency in India

आपातकाल के दौरान इंदिरा का विरोध करने वाले जयप्रकाश नारायण की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Jayprakash Narayan who opposed Indira Gandhi during Emergency in India

एकता में अनेकता वाले लोकतांत्रिक देश भारत में जब भी कभी लोकतंत्र पर किसी तरह के खतरे की आशंका हुई है तब तक देश में बड़ी बड़ी क्रांतियां हुई है और लोकतंत्र को खतरों से मुक्त कराया गया है।
और ऐसे खतरों से लड़ने के लिए कई महान सपूत इस पावन धरती पर अवतरित हुए इसी में से एक थे जय प्रकाश नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को एक लोकतांत्रिक खतरा बताया और सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया।

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1903 को सारण जिले के सिताबदियारा नामक गांव में हुआ था जो घाघरा नदी के तट पर स्थित था जो हमेशा बाढ़ की चपेट में रहता था।

इसी वजह से जय प्रकाश नारायण का परिवार वहां से हटकर कुछ दूर आगे चला गया स्थान अप उत्तर प्रदेश में आता है।

जयप्रकाश नारायण की रुचि बचपन से ही पढ़ने लिखने में थी जब जयप्रकाश नारायण मात्र 9 वर्ष के थे तब वे पटना आए और सातवीं कक्षा में अपना दाखिला कराया।

मत 9वर्ष की आयु में जयप्रकाश नारायण उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाएं सरस्वती, प्रभा और प्रताप को पढ़ना शुरू कर दिए थे।

पटना में अध्ययन के दौरान उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं को पढ़ना शुरू कर दिया और उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के श्री कृष्ण के अनमोल वचनों का अध्ययन किया।
सन 1918 जय प्रकाश नारायण ने अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त की और इन्हें स्टेट पब्लिक मैट्रिकुलेशन एग्जामिनेशन का सर्टिफिकेट दिया गया।

जब जयप्रकाश नारायण मात्र 18 साल के थे तभी उनका विवाह बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती से हो गया प्रभावती उस समय मात्र 14 साल की थी।

विवाह के बाद जय प्रकाश नारायण पटना में रहने लगे क्योंकि वह पटना में ही कार्य कर थे जिसकी वजह से पत्नी के साथ रहना उनके लिए संभव नहीं था।

उसी दौरान महात्मा गांधी ने उनकी पत्नी को न्योता दिया और में महात्मा गांधी के आश्रम में सेवा करने लगी।
महात्मा गांधी ने उसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जारी किए गए रौलट एक्ट के खिलाफ असहयोग आंदोलन कर रहे थे इस आंदोलन में मौलाना आजाद ने एक बेहद शानदार भाषण दिया जिससे लोग प्रभावित हो गए।

जयप्रकाश नारायण मौलाना आजाद के तर्कों से काफी प्रभावित हुए जिसमें मौलाना आजाद ने लोगों से अंग्रेजी हुकूमत की शिक्षा को त्यागने का आग्रह किया था जयप्रकाश नारायण आंदोलन से लौटकर पटना आए और उस समय उनकी परीक्षा मात्र 20 दिन बची थी और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया तथा बाद में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा स्थापित कॉलेज बिहार विद्यापीठ में अपना दाखिला कराया।


बिहार विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी करने के बाद जयप्रकाश नारायण ने अमेरिका से शिक्षा प्राप्त करने की ठानी और मात्र 20 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका रवाना हो गए।
जयप्रकाश नारायण 8 अक्टूबर 1922 को कैलिफोर्निया पहुंच गए लेकिन उनका दाखिला जनवरी 1923 में बर्कले विश्वविद्यालय में हुआ।




जयप्रकाश नारायण के पास अपनी फीस चुकाने के लिए पैसे नहीं थे और उन्हें किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली थी इसलिए जय प्रकाश नारायण ने एक मिल फैक्ट्री मैं काम करना शुरू कर दिया इसके साथ उन्होंने होटलों में बर्तन धोने का काम और गैरेज में गाड़ी बनाने का भी कार्य किया।
बावजूद इसके उन्हें शिक्षा में काफी कठिनाई आई क्योंकि बर्कली की फीस दोगुनी बढ़ा दी गई थी जिसके बाद इन्हें बर्कली विश्वविद्यालय छोड़कर यूनिवर्सिटी आफ लोया में अपना दाखिला कराना पड़ा।

पढ़ाई करते समय है मार्क्स के दास कैपिटल पढ़ने का मौका मिला। इसी समय इन्हें रूस क्रांति की के सफलता की खबर मिली और जयप्रकाश नारायण इससे काफी प्रभावित हुए।

सन 1929 में जयप्रकाश नारायण अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त करके भारत वापस आ गए उस दौरान उनकी पूरी विचारधाराएं मार्क्सवादी हो गई थी और भारत आकर उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी जॉइन कर लिया।

जब सन 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ था उस समय ब्रिटिश हुकूमत ने इन्हें जेल में डाल दिया जेल में इनकी मुलाकात प्रखर राष्ट्रवादी और समाजवादी राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन अशोक मेहता युसूफ देसाई सीके नारायण स्वामी पवन सिंहा मीनू मस्तानी तथा और कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से मुलाकात हुई। इस मुलाकात की वजह से कांग्रेसमें एक वामपंथी दल का निर्माण हुआ इसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गया जिसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव और महासचिव जयप्रकाश नारायण थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के समय सन 1942 में इन नेताओं को गिरफ्तार किया गया और हजारीबाग के जेल में रखा गया इस दौरान जयप्रकाश नारायण अपने साथियों सूरज नारायण सिंह गुलाब चंद गुप्ता राम आसरे मिश्रा शालिग्राम सिंह योगेंद्र शुक्ला आदि से मिलकर देश की आजादी के लिए आंदोलन की योजनाएं बनाने लगे।

जयप्रकाश नारायण अपने आंदोलनों की वजह से काफी प्रसिद्ध होने लगे तथा बाद में इन्हें ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष बनाया गया जो कि भारत का सबसे बड़ा श्रमिक दल था इसके अध्यक्ष पद पर है स्पोर्ट्स तक कार्यरत रहे।

भारत की आजादी के 27 वर्ष बाद जब देशवासी भ्रष्टाचार भुखमरी और महंगाई से ग्रस्त थे और देश को एक बड़ी क्रांति की आवश्यकता थी उस समय जय प्रकाश नारायण ने सन 1974 में बिहार के छात्रों के साथ मिलकर छात्र आंदोलन की शुरुआत की जो एक विकराल रूप ले लिया और छात्रों के साथ साथ हम लोग इस आंदोलन से जुड़ने लगे जिसे बाद में बिहार आंदोलन कहा गया इस आंदोलन को जय प्रकाश नारायण ने शांतिपूर्ण संपूर्ण क्रांति नाम दिया।


जब देश में इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 आपातकाल की घोषणा की थी उस दौरान इलाहाबाद कोर्ट ने इंदिरा गांधी को एल्क्टोरल कानून को तोड़ने का दोषी पाया और इसी को मुद्दा बनाकर जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी के साथ साथ अन्य कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी इस्तीफे की मांग करने लगे।


जयप्रकाश नारायण ने इसके बाद सरकार के विरोध में रामलीला मैदान में लाखों लोगों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता सिंहासन खाली करो जनता आती है को दोहराया जिसके बाद इन्हें पुणे गिरफ्तार कर लिया गया और चंडीगढ़ के जेल में रखा गया।

इसी दौरान बिहार में भीषण बाढ़ आ गई और जयप्रकाश नारायण सरकार से 1 माह के लिए पैरोल की मांग करने लगे ताकि वे बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का जायजा ले सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बीच में उनकी तबीयत खराब होने लगी।

तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद 12 नवंबर को इन्हें जेल से रिहा कर दिया गया उसके बाद उन्हें डायग्नोसिस के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और जहां पता चला कि उन्हें किडनी संबंधित बीमारी है जिसके बाद उन्हें हमेशा डायग्नोसिस का सहारा लेना पड़ा।

कुछ समय बाद नोबेल पुरस्कार प्राप्त नोएल बेकर ने फ्री जेपी कैंपस का नेतृत्व किया जिसका मुख्य उद्देश्य जयप्रकाश नारायण को जेल से मुक्त कराना था।

18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने देश से आपातकालीन हटा दी और चुनाव की घोषणा की गई उसी दौरान जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी का गठन किया गया और जनता पार्टी ने चुनाव में विजई हुई तथा देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार आई।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी ने अपार सफलता हासिल की बावजूद इसके जयप्रकाश नारायण राजनीतिक पद से दूर रहें और मोरारजी देसाई को भारत का प्रधान मंत्री मनोनीत किया।


जयप्रकाश नारायण उच्च नीच कि भेदभाव ना से परे उन्नति की बात करने वाले आदर्श व्यक्ति थे उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत तेज था।

8 अक्टूबर सन 1979 को बिहार के पटना में भारत मां के अमर सपूत हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गया।

देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सन 1998 में लोकनायक और प्रखर समाजवादी जय प्रकाश नारायण को मरणोपरांत भारत के सरोज सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

महान राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बारे में लिखा है।


है जय प्रकाश व नाम जिसे इतिहास आदर देता है।बढ़कर जिस के पद चिन्हों की उन पर अंकित कर देता है।।कहते हैं जो यह प्रकाश को नहीं मरण से जो डरता है।ज्वाला को बुझते देख कुंड में कूद स्वयं जो पड़ता है।।




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