Satyam Bruyat - Career Solution: महान क्रांतिकारी राजगुरु की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Rajguru

महान क्रांतिकारी राजगुरु की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Rajguru

देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले महान क्रांतिकारियों में से एक थे शिवराम हरी राजगुरु.
शिवराम हरी राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1968 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ा नामक ग्राम में हुआ था.
शिवराम हरी राजगुरु हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे जिसका मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजो को भारत से भगाना और ब्रिटिश राज्य से मुक्ति पाना.

जब राजगुरु मात्र 6 वर्ष के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया उसके बाद इनका पालन उनकी मां पार्वतीबाई और उनके बड़े भाई द्वारा किया गया उन्होंने अपने गांव से ही प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की इसके बाद संस्कृत की पढ़ाई के लिए वाराणसी चले गए मात्र 15 वर्ष की आयु में ही राजगुरु को हिंदू धर्म ग्रंथों के बारे में अच्छा खासा ज्ञान हो गया था.




वाराणसी में राजगुरु की मुलाकात कुछ क्रांतिकारियों से हुई और इस मुलाकात के बाद राजगुरु अंग्रेजी हुकूमत से देश को आजाद करवाने के संघर्ष में लग गए.

इन्होंने 1924 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन को ज्वाइन किया यह एक क्रांतिकारी संगठन था जिसका मुख्य लक्ष्य था कि अंग्रेजों से हिंदुस्तान को मुक्त करना.
इस संगठन को चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह सुखदेव थापर और अन्य क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से हिंदुस्तान को मुक्त कराने के लिए बनाया था.
राजगुरु को पंजाब आगरा और लाहौर के साथ-साथ कानपुर जैसे शहरों की जिम्मेदारी दी गई यह वहां जाकर लोगों को संगठन के बारे में बताते थे तथा संगठन से जोड़ने का काम करते थे.
काफी कम समय में राजगुरु भगत सिंह के अच्छे मित्र बन गए और इन दोनों ने मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलन किए.

लाठीचार्ज में जब लाला लाजपत राय की हत्या हो गई उसी का बदला लेने के लिए राजगुरु और उनके साथियों ने एक नई रणनीति बनाई जिसके अनुसार क्रांतिकारी जय गोपाल को स्टार्ट की पहचान करनी थी चौकी राजगुरु और उनके साथी स्कर्ट को पहचानते नहीं थे तथा आपके सी प्लान को अंजाम देने के लिए 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और राजगुरु लाहौर के पास जिला मुख्यालय के बाहर एस्कॉर्ट का इंतजार कर रहे थे तभी जय गोपाल ने एक पुलिस अफसर की ओर इशारा किया और इन्हें बताया कि यही स्कॉट है और यह सारा मिलते ही राजगुरु और सुखदेव ने स्कॉट को गोलियों से भून दिया.
लेकिन जय गोपाल ने किस की तरफ इशारा किया था वह स्कॉट नहीं था बल्कि जेपी सांडर्स था जो एक सहायक आयुक्त था.
अंग्रेजों कुछ बात का शक हो गया कि जेपी सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह का हाथ है और उन्होंने इसी शक के आधार पर भगत सिंह को पकड़ने का कार्य शुरू कर दिया.

अंग्रेजों से बचने के लिए भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर को छोड़ने का फैसला किया और ट्रेन के माध्यम से राजगुरु लखनऊ पहुंचे जहां से उतरकर बनारस के लिए रवाना हो गए.

कुछ समय तक उत्तर प्रदेश में रहने के बाद राजगुरु वहां से नागपुर की ओर निकल गए जहां पर इन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता के घर आश्रय लिया.

30 सितंबर 1929 को जब राजगुरु नागपुर से पुणे जा रहे थे तब इन्हें अंग्रेज पुलिस अधिकारी द्वारा पुणे में गिरफ्तार कर लिया गया.

सांडर्स की हत्या में दोषी पाए जाने पर 23 मार्च 1931 को राजगुरु को भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी पर लटका दिया गया.

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