सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है
महान क्रांतिकारी और हिंदी और उर्दू के मशहूर कवि श्री राम प्रसाद बिस्मिल जी के बारे में जो खासकर देशभक्ति की कविताएं लिखते थे बिस्मिल जी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक में से एक थे इन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी को अपना लक्ष्य बना लिया था.
अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए इन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में काकोरी कांड का प्लान बनाया था जिसमें पकड़े जाने के बाद ही नहीं गोरखपुर जेल में फांसी दे दी गई.
श्री रामप्रसाद जी का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 11 जून 1897 को हुआ था, उन्होंने अपने पिता से हिंदी की शिक्षा दी थी तथा एक माली से उर्दू की शिक्षा प्राप्त की.
श्री राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज का हिस्सा बन गए थे तो उस समय सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी.
त्रिवेदी नाम का एक क्रांतिकारी संगठन बनाया जिसका लक्ष्य था अंग्रेजों से लोहा लेना.
28 जनवरी 1980 को बिस्मिल्लाह एक  पंपलेट बनाकर बांटना शुरू किया जिसका नाम था देशवासियों के नाम संदेश संगठन के लिए फंड इकट्ठा करने के लिए 1918 में लोगों ने अंग्रेजों को तीन बार लूटा.
इसके बाद रामप्रसाद बिस्मिल दिल्ली चले गए और वहां पर प्रतिबंधित किताबों को बेचने लगे थे यह किताबें प्रतिबंधित इसलिए थी क्योंकि इनमें अंग्रेजो के खिलाफ काफी कुछ लिखा था.
जब उन्हें लगा कि वह पकड़े जा सकते हैं तब उन्होंने बच्चों की किताबों को लेकर भाग गए, एक बार वह अपने साथियों के साथ मिलकर दिल्ली और आगरा के बीच में लूट का प्लान बना रहे थे उसी समय पुलिस आ गई और दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई, बिस्मिल जी नदी में कूद गए और पानी के अंदर तैरते हुए वहां से बाहर निकल गए. उनकी बात की साथी गिरफ्तार कर लिए गए पता पुलिस को लगा कि बिस्मिल फायरिंग में मारे गए.



कुछ दिनों बाद पुलिस को पता चल गया कि बिस्मिल जिंदा है. वहां से बिस्मिल दिल्ली चले गए इसके बाद 2 साल तक सरकार की आंखों से बचते हुए जगह-जगह लोगों को जागरुक करते रहे और देशभक्ति की कविताएं लिखते थे करने के लिए प्रोत्साहित करने लगे.
चौरी चौरा कांड में लोगों के गुस्से के लिए इनके भाषण को भी जिम्मेदार बताया गया इसी कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया जिसके कारण बिस्मिल और अनेकों साथी कांग्रेस से नाराज हो गए थे.
उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक संगठन बनाया जिस संगठन में काकोरी कांड का ढांचा तैयार किया गया जिसका प्रतिनिधित्व रामप्रसाद बिस्मिल कर रहे थे.
लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन को रोक कर उसमें मौजूद सरकारी खजाना लूट लिया गया इसमें दोनों तरफ से फायरिंग हुई और इसमें एक भारतीय मारा गया.
इसी मामले में केस हुआ फिर 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई.
श्री राम प्रसाद बिस्मिल का अंतिम संस्कार राप्ती नदी के किनारे किया गया जिसे आज राजघाट के नाम से जाना जाता है .