जब भी हम देश की आजादी के बारे में सोचते हैं हमारे दिल में कई नाम और आंखों के सामने कई चेहरे आ जाते हैं.
ऐसे नायक जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया उन्हीं में से एक थे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे नगवा गांव के मंगल पांडे जिनका जन्म 30 जनवरी 1827 में हुआ था.
मंगल पांडे का पूरा नाम वीर व र मंगल पांडे था, मंगल पांडे का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है. मंगल पांडे के पिता श्री दिनकर पांडे फैजाबाद के निवासी थे जो किन्ही कारणों से अपना पैतृक गांव छोड़कर नगवा आए थे जहां पर उनकी मुलाकात एक युवती से हुई और दिनकर पांडे ने नगवा में ही शादी कर ली और वहीं बस गए.
मंगल पांडे द्वारा भड़काई के Kranti से अंग्रेजी शासन पूरी तरह से पस्त हो गई थी लेकिन अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबा दिया मंगल पांडे को फांसी देकर. लेकिन मंगल पांडे की शहादत ने देश में जो क्रांति उत्पन्न किया उस क्रांति ने अंग्रेजों को सौ साल के भीतर ही भारत को छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी में एक सिपाही थे. 1857 की क्रांति ने एक ऐसे विद्रोह को जन्मे मंगल पांडे ने दिया जो संपूर्ण भारत में आग की तरह फैल गई और क्रांति आगे बढ़ती गई.
मंगल पांडे एक महान गायक थे जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने गद्दार और विद्रोही माना लेकिन वह भारतीयों के लिए एक महानायक ही हमेशा रहे. मंगल पांडे की क्रांति में ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ों को हिलाकर रख दिया.
विद्रोह ज्यादातर बड़ा जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में यह बात फैल गई कि जिन कारतूस को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलते हैं उसमें सूअर और गाय की चर्बी मिलाई जाती है. लोगों में यह बात स्पष्ट हो गई कि अंग्रेज भारत में हिंदू सभ्यता और हिंदुस्तानियों के धर्म को भ्रष्ट करने पर आमादा है क्योंकि गाय और सूअर हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए नापाक था.




अंग्रेजी शासन में भारतीय सैनिकों के साथ हमेशा से ही भेदभाव होता रहा और अंग्रेजी शासन से भारतीय सैनिक संतुष्ट नहीं थे इसी बीच कारतूसों में चर्बी की अफवाह ने आग में जी का कार्य किया और जब 1857 में नए कारतूस सेना को बांटा गया उसी समय मंगल पांडे ने उसने कारतूस को लेने से इंकार कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी सेना ने मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लिए तथा वर्दी उतार लेने का हुक्म दिया इस बीच नया मोड़ आया कि मंगल पांडे ने उस आदेश को मानने से ही इनकार कर दिया.
29 मार्च 1857 को जब अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन मंगल पांडे से उनकी राशिफल सुनने के लिए आगे बढ़े हुए उसी समय मंगल पांडे ने उन पर हमला कर दिया.

29 मार्च को ही मंगल पांडे ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बैरकपुर छावनी में बजा दिया तथा अपने साथियों से आवाहन किया कि मुकेश संघर्ष में उनका साथ दें लेकिन किसी ने भी मंगल पांडे का साथ नहीं दिया फिर मंगल पांडे ने उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट अपने ही राइफल से उतार दिया जो मंगल पांडे की वर्दी छीनने और राइफल छीनने के लिए आगे आया था.

मंगल पांडे पर कोर्ट मार्शल के तहत मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई, अंग्रेजी सरकार के द्वारा उन्हें 18 अप्रैल को फांसी दी जानी थी लेकिन अंग्रेजी सरकार ने मंगल पांडे को 10 दिन पहले ही फांसी दे दी जो कि पहले से निर्धारित की गई थी और इस प्रकार 8 अप्रैल 1857 को एक महान भारतीय नायक पंचतत्व में विलीन हो गया.

मंगल पांडे की फांसी की खबर देश भर में फैल गई और जगह-जगह पर हिंसा भड़क गया लेकिन उनके देश इस हिंसा को दबाने में सफल हो गए.
1857 में मंगल पांडे ने जो क्रांति का बीज बोया था वह 90 साल बाद एक ब्रिज के रूप में तब्दील हो गया और 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा.