चितरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1890 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ था उनका तालुक ढाका के विक्रमपुर के तेलीरबाग के प्रसिद्ध दास परिवार से था.
चितरंजन दास के पिता भुवन मोहन दास कोलकाता उच्च न्यायालय में वकील थे, चितरंजन दास अपने पिता की तरह मशहूर वकील बनना चाहते थे 1890 में b.a. पास करने के बाद आईपीएस बनने के लिए इंग्लैंड चले गए और 1892 में बैरिस्टर बंद कर भारत लौटे।

चितरंजन दास सन 1919 से 1922 के बीच में बंगाल में हुए अधिकार आंदोलन के समय बंगाल के मुख्य नेताओं में से एक थे तथा चितरंजन दास ने ब्रिटिश कपड़ों का भी काफी विरोध किया इतना ही नहीं उन्होंने ब्रिटिश कपड़ों को जलाया और खादी पहनने लगे।

कोलकाता में म्युनिसिपल कारपोरेशन की स्थापना की गई तब चितरंजन दास पहले महापौर बने। 1923 में उन्होंने मोतीलाल नेहरू और युवा हुसैन शहीद सुहरावर्दी के साथ मिलकर स्वराज्य पार्टी की स्थापना की।

चितरंजन दास को अहिंसा और कानूनी विधियों पर यकीन था इतना ही नहीं उन्हें इस बात का भी यकीन था कि अहिंसा और कानूनी विधियों के दम पर आजादी ला सकते हैं और हिंदू मुस्लिम में एकता भी बना सकते हैं।


उनके विचारों को उनके शिष्य आगे ले गए और नेताजी सुभाष चंद्र बोस चितरंजन दास के विचारों पर चलने लगे चितरंजन दास के देश प्रेमी विचारों की वजह से उन्हें देशबंधु की संज्ञा दी गई।

चितरंजन दास 1996 कांग्रेस में शामिल हुए तथा 1917 में बंगाल की प्रांतीय राजकीय परिषद के अध्यक्ष बन गए तथा राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय हो गए।

चितरंजन दास को उनके उपग्रह विचारों और उनकी नीतियों की वजह से जाना जाता था उनके विचारों और उग्र नीतियों की वजह से सुरेंद्र नाथ बनर्जी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेश को छोड़ कर चले गए।

असहयोग आंदोलन के दौरान हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल छोड़ दिया तब उनकी शिक्षा के लिए चितरंजन दास ने ढाका में एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की तथा असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने कांग्रेश के लिए स्वयंसेवकों का प्रबंध किया।

ब्रिटिश हुकूमत ने असहयोग आंदोलन को अवैध करार दिया और चितरंजन दास को उनकी पत्नी के साथ गिरफ्तार करके 6 महीने जेल की सजा दी गई चित्तरंजन दास की पत्नी का नाम भी था और बसंती देवी और सहयोग में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला थी।

क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बसंती देवी बहुत ही आदरणीय थी तथा सुभाष चंद्र बोस उन्हें मां कहा करते थे।



सन 1921 में जब चितरंजन दास जेल में थे तब उन्हें कांग्रेश के अहमदाबाद अधिवेशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन जेल में होने की वजह से उनके प्रतिनिधि के रूप में हकीम अजमल खान ने अध्यक्ष का कार्यभार संभाला चितरंजन दास जेल से निकले तब उन्होंने सोचा कि बाहर से आंदोलन करने से अच्छा काउंसिल परिषदों में घुसकर भीतर से अड़ंगा लगाया जाए लेकिन कांग्रेस को इनकी या नीति पसंद नहीं आई जिसके बाद उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और पंडित मोतीलाल नेहरू हुसैन सहित स्वराज दल की स्थापना की।

चितरंजन दास के दल स्वराज्य को बंगाल परिषद में निर्विरोध चुना गया जिसके बाद चितरंजन दास ने मंत्रिमंडल बनाना अस्वीकार कर दिया और 1-1 मॉन्टफोर्ड सुधारों के लक्ष्यों की दुर्गति कर दी।

सन 1924 में चितरंजन दास को कोलकाता नगर महापालिका का मेला चुना गया इस दौरान कांग्रेश पार्टी में स्वराज पार्टी का पूरा वर्चस्व था तथा कांग्रेसी पटना अधिवेशन में चितरंजन दास ने उनकी पार्टी की सदस्यता के लिए सूट काटने की अनिवार्यता  समाप्त कर दिया।

चितरंजन दास की पत्नी बसंती देवी भी स्वतंत्रता अभियान में उनकी सहायता करती थी 725 में ज्यादा काम की वजह से चितरंजन दास की सेहत धीरे धीरे खराब होने लगी इसलिए उन्होंने कुछ समय के लिए आंदोलनों से अलग होने का निर्णय लिया और दार्जिलिंग चले गए।

चितरंजन दास को महात्मा गांधी भी अक्सर देखने के लिए दार्जिलिंग जाते थे 16 जून 1925 को ज्यादा बुखार होने की वजह से चितरंजन दास की मृत्यु हो गई।


चितरंजन दास देशबंधु के नाम से प्रसिद्ध है और उन्होंने अपना सारा जीवन देश की आजादी के लिए अर्पण कर दिया उन्होंने देखा था और हमेशा भारत की आजादी के लिए ही बोलते थे इसके सिवा उनके जिंदगी में कुछ भी नहीं था।

चितरंजन दास की अंतिम यात्रा में हजारों लोग कोलकाता के गोरा काला महा श्मशान में जुटे जहां चितरंजन दास को मुखाग्नि दी गई।
चितरंजन दास को बंगाल का बेताज बादशाह की पदवी दी गई थी वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव नेता थे देश की आजादी के लिए त्याग कर दिया उनके अटूट देश प्रेम के कारण हुआ था अपने सिद्धांतों के एवं मानवतावादी धर्म के पक्षधर थे इतिहास उनके योगदान को हमेशा याद रखेगा।