शहीद उधम सिंह ने अपने 21 सालों का संकल्प पूरा करते हुए अपना जीवन देश के लिए न्योछावर कर दिया
 सरदार उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के सोनम नाम के एक गांव में हुआ था पैदा होने की सिर्फ 2 साल बाद मां की मृत्यु हो गई और फिर 8 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता को भी खो दिया जिसके बाद उन्हें और उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह को अमृतसर के एक अनाथालय में डाल दिया गया
उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह था लेकिन अनाथालय में शिक्षा देकर उधम सिंह का नाम दिया गया .
आगे चलकर हाई स्कूल के एग्जाम पास करने के बाद 1919 में उन्होंने अनाथालय को छोड़ दिया जिसके बाद 13 अप्रैल 1919 को स्थानीय लोगों ने अंग्रेजों के विरोध में जलियांवाला बाग में एक विशाल सभा का आयोजन किया था लोगों को पानी पिलाने के काम में लगे हुए थे उस समय पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ डायर को इस बात का पता चला तो उन्होंने अपनी सेना को बिना किसी पूर्व सूचना के सभा में आने का आदेश दे दिया जिसके बाद अंग्रेजों ने लगातार 20 मिनट तक गोलियां चलाई जिसमें हजारों की संख्या में लोग मारे गए अलग है लेकिन भगदड़ में दब जाने की वजह से भी सैकड़ों लोगों की जान चली गई और बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता था और चारों तरफ से घिरा हुआ था और एक छोटे से दरवाजे पर भी थी और जो भी बाहर निकलने की कोशिश करता था उसे उड़ा दिया जाता था.
लोग बाहर नहीं निकल सकते और अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए.
सौभाग्य से उधम सिंह की जान बच गई उधम  सिंह 20 साल के थे मात्र 20 साल की उम्र में उधम सिंह ने निर्णय लिया कि जिन लोगों  ने लोगों पर बेवजह गोलियां चलाई है उसे जीवित नहीं छोडूंगा और यही मेरे जीवन का आखरी संकल्प है आगे चलकर अपने संकल्प को पूरा करने के लिए 1924 में गदर पार्टी में शामिल हो गए और भगत सिंह के पदचिन्हों पर चलने लगे आगे चलकर उन्होंने और कुछ पैसे जुटाए ताकि वह जनरल डायर को मारने के लिए हथियार खरीद सके.
अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उधम सिंह ने कई देशों की यात्राएं की और इस दौरान अवैध हथियार रखने के जुर्म में उन्हें 5 साल की सजा सुनाई गई.
हथियार रखने के जुर्म में 5 साल का जेल भी हुआ लेकिन जेल से छूटने के बाद फिर से वह अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ने लगी जिसके बाद 1934 में लंदन और वहां 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे.
जहां उन्होंने 6 गोलियों वाली एक रिवाल्वर खरीदी लंदन में रखते हुए उधम सिंह के पास कई ऐसे मौके थे जब जनरल डायर को मार सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया उन्होंने कहा कि डायर ने भरी सभा में मेरे देशवासियों को मारा है और मैं भी कुछ ऐसा ही करूंगा.
21 साल बाद 13 मार्च 1940 को यह मौका आया और लंदन के Caxton हाल में जनरल डायर के सम्मान में एक सभा रखी गई थी.
जहां पर उधमसिंह गए और किताब के बीच में रिवाल्वर छिपाकर जनरल डायर की तरफ बढ़े और उन्होंने डायर पर 3 गोलियां चला दी.
डायर को मारने के बाद उधमसिंह वहां से भागे नहीं खुद को सरेंडर कर दिया.
जब कोर्ट में उधम सिंह के पूछा गया कि तुम भाग सकते थे लेकिन भाग्य क्यों नहीं तब उधम सिंह ने जज को यह जवाब दिया कि मैं इसलिए नहीं भागा कि मेरे फांसी चढ़ने पर मेरे जैसे हजारों उधमसिंह मेरे देश में जन्म लेंगे.



31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को फांसी की सजा दे दी गई और वह शहीद हो गए.