मैडम भीकाजी कामा की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and struggle of madam bhikaji kama

देश के बाहर रहते हुए देश में आजादी की लड़ाई को शुरू करने वाली महान स्वतंत्रता सेनानी थी मैडम भीकाजी कामा.
अंतर्राष्ट्रीय असेंबली में भारत के दोस्त को लहराने वाली प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी थी उन्होंने ऐसो आराम की जिंदगी के बजाय भारत मां की सेवा करने को प्राथमिकता दी.
मैडम भीकाजी कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 में महाराष्ट्र में हुआ था उनके पिता का नाम सोरावती प्रेम जी पटेल तथा माता का नाम जीजाबाई था.




मैडम भीकाजी कामा को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के प्रथम प्रारूप की जननी कहा जाता है, वह एक प्रखर वक्ता थी तथा उन्होंने लंदन, पेरिस , बरलिन, वियना की प्रबुद्ध जनता को अंग्रेजी हुकूमत के दमनकारी नीतियों से अवगत कराया.

मैडम भीकाजी कामा समाज और अपने परिवार की चिंता किए बिना दृढ़ता और अदम्य साहस के साथ भारत की आजादी की लड़ाई में चल पड़ी.

जब दिसंबर 1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तो कांग्रेसी नेताओं के विचारों और उनके ओजपूर्ण भाषणों से प्रभावित होकर मैडम भीकाजी कामा कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई और उन्होंने ऊंच-नीच धर्म, जाति-पाति, मजहब की भेदभाव वाले समाज से ऊपर उठकर सभी धर्म जाति की महिलाओं को एक मंच पर लाने का तथा उन्हें एकजुट करने का कार्य किया.

जब मुंबई में ब्लैक फैला तो मैडम भीकाजी कामा स्वयं राहत कार्य में जुट गई और इस वजह से वह बीमार हो गई. तथा इलाज के लिए उन्हें 1902 में इंग्लैंड भेज दिया गया, कई देशों की यात्रा करते हुए जब 1905 में मैडम भीकाजी कामा लंदन पहुंची तो वहां उनकी मुलाकात दादाभाई नौरोजी से हुई जो एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे.


सन 1905 मैडम भीकाजी कामा अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर लंदन में भारतीय झंडे का पहला प्रारूप तैयार किया जिसमें हरा लाल और केसरी रंगों की पट्टियों को मिलाया गया था.
सन 1909 यह तिरंगा बंगाल में पर आएगा उससे पहले इसे बर्लिन में फहराया गया था.

भारत की आजादी की लड़ाई में मैडम भीकाजी कामा का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण था उनके व्यक्तित्व और कार्य से प्रभावित होकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कई बार सम्मान करने के लिए आमंत्रित किया लेकिन मैडम भीकाजी कामा ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा मिलने वाले सम्मान को नहीं लिया.

मैडम भीकाजी कामा उन महान लोगों में से एक है जो अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना संपूर्ण जीवन समाज के विकास और सामाजिक कार्यों में लगा दिया.

13 अगस्त‎, ‎सन 1936 में मुंबई के पारसी जनरल अस्पताल में मैडम भीकाजी कामा ने अपनी अंतिम सांस ली और उनका अंतिम शब्द था वंदे मातरम.


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