जिसने अपने देश को आजादी दिलाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी लेकिन वही देश आजादी के बाद उस के बलिदान को पूरी तरह से भूल गया इस महान क्रांतिकारी को आजादी के बाद अपना पेट पालने के लिए सिगरेट बेचनी पड़ी.
अपनी जिंदगी के अस्पताल में मौत का इंतजार करते रहे , बटुकेश्वर दत्त जिन्हें अपनी जिंदगी के अंतिम दिन अंतिम दिनों तक यह मलाल रहा कि उन्हें भी भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी दे दी जाती तो उन्हें ऐसे भारत का घिनौना चेहरा देखने को नहीं मिलता.
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, ज़िला-नानी बेदवान बंगाल में हुआ था
दिल्ली की विधानसभा में जिसे आज संसद भवन कहते हैं भगत सिंह ने एक बम फेंका था जिस काम में बटुकेश्वर दत्त उनके साथ थे इसके बाद दोनों क्रांतिकारियों ने अपनी गिरफ्तारी दी जहां बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी की सजा सुनाई गई और अंडमान निकोबार भेज दिया गया.
जो बटुकेश्वर दत्त को यह पता लगा कि मेरे साथ भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई है तो उन्होंने वहां से भगत सिंह को एक पत्र लिखा मैं अपने आपको बहुत अपमानित महसूस कर रहा हूं क्योंकि मुझे आजीवन कारावास की सजा हुई और आप तीनों लोगों को भारत माता की गोद में सोने का सौभाग्य मिला.
तुम्हारा प्रिय भाई भगत इसके बाद जेल में ही बटुकेश्वर दत्त ने 1935 और 1937 में दो ऐतिहासिक भूख हड़ताल कि वहां जेल में है ना टीवी की बीमारी हो गई और उन्नीस सौ से 10 महीने पटना लाया गया और फिर 1938 में रिहा कर दिया गया लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा और जिसके बाद 1945 में यह रिहा हुए और 1947 में देश आजाद हुआ इस महान क्रांतिकारी को तब तक बना चुके थे.
जिस सम्मान के वह अधिकारी थे उन्हें वह नहीं मिला, नवंबर 1947 में वह शादी के बंधन में बंध गए और उनके सामने परिवार को चलाने की जिम्मेदारी आई तो उन्हें देश की किसी भी संस्था ने नौकरी नहीं दी तब बेबस होकर उन्हें एक सिगरेट कंपनी में काम करना पड़ा उन्होंने बिस्कुट का एक छोटा सा बिजनेस शुरू किया जिसमें नुकसान होने की वजह से उसे बंद करना पड़ा.
भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में से एक क्रांतिकारी को अपनी रोजी रोटी के लिए इस कदर भटकना पड़ा एक और ऐसी घटना है जब पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे इसके लिए दत्त ने भी आवेदन किया था परमिट के लिए जब वह पटना के कमिश्नर से मिलने गए तब कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा यह सुनकर बहुत दुखी हुए जब अखबारों में छपी राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को यह पता चला तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर दत्त से माफी मांग ली 1963 में बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया गया मगर वह राजनीति की दुनिया से परे थी और तब तक ही रहने लगे थे 1964 में वह गंभीर रूप से बीमार पड़े उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया उनकी ऐसी हालत देखकर उनके एक मित्र चमनलाल ने एक लेख में लिखा की आदत जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी गलती की है खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी जो फांसी से बाल-बाल बच गया वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एरिया रगड़ रहा है उसे कोई पूछने वाला नहीं है जब अखबार में लेख छपा सत्ता में बैठे लोगों को होश आया और सरकार उनकी मदद के लिए सामने आई लेकिन तब की हालत काफी बिगड़ चुकी थी 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया जहां पर उन्होंने पत्रकारों से कहा सपने में भी नहीं सोच सकता था कि जिस दिल्ली में मैं बम फेंक लूंगा उस दिल्ली में मैं अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा.
दिल्ली में एम्स में भर्ती किया गया जहां जांच में पता चला कि इन्हें कैंसर है और इनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बचे हैं उन दिनों को अक्सर भगत सिंह सुखदेव राजगुरु और अपने सारे क्रांतिकारी दोस्तों को याद करके रोते रहते थे भगत सिंह की मां विद्यावती जी को बटुकेश्वर दत्त के बारे में पता लगा तो वह तुझसे मिलने हॉस्पिटल आए और भगत के दोस्त बटुकेश्वर की हालत देखकर बहुत दुखी हुए.
और 20 जुलाई 1965 को रात 1:50 पर भारत का यह क्रांतिकारी दुनिया छोड़कर चला गया उनका अंतिम संस्कार के अनुसार हुसैनीवाला पंजाब में किया गया.



जब 1968 में भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के समाधि तीर्थ का उद्घाटन किया जा रहा था तब भगत सिंह की मां ने उनकी समाधि पर फूल चढ़ाने से पहले बटुकेश्वर दत्त की समाधि पर फूल चढ़ाए थे बटुकेश्वर की यही तो एक मात्र इच्छा थी कि उन्हें भगत सिंह से अलग ना किया जाए.